Friday, September 30, 2011

शिव ताण्डवं स्तूति कवि दीप चारण कृतं




शिव ताण्डवं स्तूति
कवि दीप चारण कृतं



डम डम बजाते डमरु घम घम घुमते करते न्रत ताण्डवम ।
जटाऐँ बिखेरे भुजंग लपेटे उजङ मेँ घुमते कहते जिसे शिवा शिवम ।।  ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ।

कर सोहे डमरु डमं डमं वाला त्रिशुल विशाला
गल राजै भुजंग माला ।
जटाओं में गंगा शशि धारै, कटि पे पहने चिता मारकर चौला ।।
ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ।

ब्रम्हा विष्णु के साथ मिलके नित नित खेलते नवीन श्रृष्टि खेला ।
जगत वासी जिसे कहते भगङ भम्म भम्म बगङ बम्म बम्म भोला ।।
ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ।


जोगि बनके पर्वतोँ मेँ घूमते पीते घोट घोट कर भंगा ।
धुम्म तनन् तनन् नितनन् धुम्म तनन् तनन् नितनन् तगङी धिगङी तगङी धिगङी धुम्म तगङी धिगङी तगङी धिगङी धुम्म न्रत ताण्डव करते होके अध नंगा ।
ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ।

शीश झुकाकर नत मस्तक होते सुर असुर इन्द्र अरु चन्द्र ।
जग का प्यारा सबसे न्यारा देवोँ का देव महादेव भोला बाबा रुद्र ।।
ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ।



दीदार तेरा पाकर मेनेँ चित मेँ बसा ली तेरी छवि ।
बस इतनी विद्या दे दे मुझको छवि तेरी कलम से ऊतारु बन के कवि ।।
दीदार तेरा पाकर मैँने जाना ब्रम्हाण्ड,जन्म मरण रहस्य ।
कहू तो कह पाता नहि लिखु तो लिख जानता नहि ये कैसी लीला तस्य ।

कवि दीप चारण